Welcome to finance Financial Services.

Jaag Re Jeev | Jinvani Ka Sandesh Jain Bhajan

Jaag Re Jeev | Jinvani Ka Sandesh Jain Bhajan

“जाग रे जीव” एक आधुनिक जैन भक्ति रचना है, जो वर्तमान समाज में बढ़ते मोह, परिग्रह, ईर्ष्या, क्रोध, भौतिकता, मोबाइल-आसक्ति और आत्मविस्मृति जैसे विषयों को जैन दर्शन की दृष्टि से प्रस्तुत करती है। यह भजन आत्मचिंतन, संयम, समता, अहिंसा और आत्मज्ञान की ओर लौटने का संदेश देता है।

✍️ गीत एवं संगीत की परिकल्पना: अंकित जैन
🎼 गीत निर्माण में AI का सहयोग लिया गया है।

यह रचना जैन धर्म के शाश्वत सिद्धांतों को आधुनिक जीवन की चुनौतियों से जोड़ते हुए आत्मजागरण और आत्मकल्याण की प्रेरणा देने का एक प्रयास है।

जाग रे जीव

कितने जन्मों से भटक रहा, कितनी बदली देह।
फिर भी अपने आप से अनजान, फिर भी जग से नेह॥

माटी को अपना मान लिया, भूल गया निज धाम।
जिनवाणी कब से पुकार रही, लेकर तेरा नाम॥

जाग रे जीव…  जाग रे जीव…

जग को देखने निकला था तू, खुद को देख न पाया।
आतमरत्न को छोड़ के प्राणी, कंकड़ में सुख पाया॥

मोह की धुंध में ऐसा खोया,  सत्य नज़र न आया।
अनमोल मानव जन्म मिला था, यूँ ही उसे गंवाया॥

ऊँची बातें, ऊँचे सपने, ऊँचे-ऊँचे मकान।
लेकिन मन की सूनी धरती, माँगे प्रेम की छाँव॥

धन आया तो मान बढ़ा है, मान बढ़ा तो द्वेष।
द्वेष बढ़ा तो शांति खोई, यही जगत का क्लेश॥

दूजे की उन्नति देख-देखकर, मन में उठे विचार।
क्यों उसका आँगन महके, क्यों मेरा वीरान॥

ईर्ष्या की इस धीमी ज्वाला में, जलता रहा जहान।
पर-सुख में जो सुखी बने, वही सच्चा इंसान॥

मोबाइल का ऐसा मोह हुआ, भूल गए परिवार।
एक ही घर में रहते सब, फिर भी कितने दूर॥

माँ की मीठी बातों से भी, मन रहता अनजान।
स्क्रीनों की चमक में खोकर, भूल गया इंसान॥

सौ-सौ लोगों से जुड़ा हुआ है, फिर भी मन अकेला।
झूठी दुनिया के पीछे भागे, छूट गया सुख मेला॥

जग की सारी खबरें रखता, अपने मन से दूर।
निज आत्मा की आवाज़ दबाकर, फिरता चकनाचूर॥

क्रोध कहे मैं राजा तेरा, मान कहे सरताज।
माया मीठे स्वप्न दिखाए, लोभ करे है राज॥

चार कषायों की बेड़ी में, बँधा हुआ संसार।
जिनवर कहते जाग मुसाफिर, खुला मोक्ष का द्वार॥

जाग रे जीव… जाग रे जीव…
राग-द्वेष की नींद से जाग…
जाग रे जीव… जाग रे जीव…
निज आत्मा की ओर तू भाग…

वन रोते हैं, नदियाँ रोतीं, रोता है आकाश।
अपरिग्रह को भूल मनुज ने, बोया केवल त्रास॥

जीव-दया का दीप बुझाकर, कैसा किया विकास।
सुविधाओं के अंबारों में, फिर भी मन उदास॥

धरती माँ की पीड़ा सुन ले, सुन ले उसकी पुकार।
जितना चाहिए उतना रख ले, यही धर्म का सार॥

ना तेरा धन साथ चलेगा, ना तेरा परिवार।
कर्मों की ही गठरी लेकर, जाना उस पार॥

ना पदवी, ना मान रहेगा, ना झूठी पहचान।
अंत समय बस साथ निभाए, अपना शुभ परिणाम॥

क्षण-क्षण जीवन ढलता जाए, जैसे रेत समान।
समय रहते पहचान स्वयं को, यही सच्चा ज्ञान॥

कितना भागे, कितना दौड़े, मन को चैन न आए।
सुख की खोज में जग भटके, सुख भीतर मुस्काए॥

अहिंसा की शीतल छाया, समता का उपहार।
संयम से निर्मल हो जीवन, खुल जाए भव-द्वार॥

क्रोध, मान, माया और लोभ, करते जीव गुलाम।
जिनवाणी का दीप जला ले, मिल जाए विश्राम॥

जग को देखने निकला था तू, खुद को देख न पाया।
आतमरत्न को छोड़ के प्राणी, कंकड़ में सुख पाया॥

जाग रे जीव… जाग रे जीव…
अपने भीतर लौट रे…

जाग रे जीव… जाग रे जीव…
निज स्वरूप को खोज रे…